पत्र 1 · हिंदी भाषा ज्ञान · अध्याय 3
समास: भेद, विग्रह और पहचान
दो या अधिक शब्दों को जोड़कर एक छोटा शब्द बनाना। परीक्षा में प्रश्न आते हैं: 'कौन-सा समास है', 'विग्रह कीजिए' और 'सही समस्त पद चुनिए'।
अंतिम अपडेट: 2026-10-14
इस अध्याय में
समास क्या है
दो या दो से अधिक शब्दों को, उनके बीच के कारक-चिह्न या जोड़ने वाले शब्द (का, के लिए, और, जो आदि) हटाकर, एक छोटे नए शब्द में बदलने की प्रक्रिया को समास कहते हैं। "समास" का अर्थ ही है संक्षेप।
- राजपुत्र = राजा का पुत्र
- रसोईघर = रसोई के लिए घर
- माता-पिता = माता और पिता
| शब्द | अर्थ | उदाहरण (राजपुत्र में) |
|---|---|---|
| समस्त पद / सामासिक पद | समास से बना नया शब्द | राजपुत्र |
| पूर्वपद | पहला शब्द | राज(ा) |
| उत्तरपद | दूसरा (अंतिम) शब्द | पुत्र |
| समास-विग्रह | समस्त पद को फिर से तोड़कर उसका पूरा अर्थ लिखना | राजा का पुत्र |
समास के भेद और पहचान की कुंजी
हिंदी व्याकरण में समास के छह भेद माने जाते हैं, और परीक्षाएँ भी इन्हीं छह को आधार मानती हैं। पहचान का सबसे पक्का तरीका है यह देखना कि कौन-सा पद प्रधान है:
| समास | कौन-सा पद प्रधान | पहचान | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| अव्ययीभाव | पूर्वपद | पहला पद अव्यय; पूरा शब्द अव्यय (क्रियाविशेषण) की तरह काम करता है | यथाशक्ति, प्रतिदिन |
| तत्पुरुष | उत्तरपद | विग्रह में कारक-चिह्न आता है (को, से, के लिए, का, में…) | राजपुत्र, रसोईघर |
| कर्मधारय | उत्तरपद | विशेषण–विशेष्य या उपमान–उपमेय का संबंध | नीलकमल, चंद्रमुख |
| द्विगु | उत्तरपद | पहला पद संख्या; अर्थ समूह का | त्रिलोक, चौराहा |
| द्वंद्व | दोनों पद | विग्रह में 'और', 'या', 'अथवा'; बीच में योजक चिह्न | माता-पिता, पाप-पुण्य |
| बहुव्रीहि | कोई नहीं — तीसरा (अन्य) पद | दोनों पद मिलकर किसी तीसरे व्यक्ति/वस्तु का बोध | दशानन (रावण), नीलकंठ (शिव) |
याद रखने का सूत्र: "अ-त-क-द्वि-द्वं-ब" — अव्ययीभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, द्वंद्व, बहुव्रीहि।
1. अव्ययीभाव समास
(क) अव्यय या उपसर्ग से शुरू होने वाले
पहचान के शब्द: यथा, प्रति, आ, भर, बे, नि/निर्, अनु, हर, उप, बा।
- यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार
- यथासंभव = जितना संभव हो
- यथासमय = समय के अनुसार
- यथाक्रम = क्रम के अनुसार
- प्रतिदिन = हर दिन / प्रत्येक दिन
- प्रत्येक = हर एक
- प्रतिक्षण = हर क्षण
- आजीवन = जीवन भर
- आमरण = मरण तक
- आजन्म = जन्म से लेकर
- भरपेट = पेट भर कर
- भरसक = शक्ति भर
- बेखटके = बिना खटके के
- बेशक = बिना शक के
- निडर = बिना डर के
- निस्संदेह = बिना संदेह के
- अनुरूप = रूप के अनुसार
- हरघड़ी = हर घड़ी
- बाकायदा = कायदे के साथ
- उपकूल = कूल (किनारे) के पास
(ख) शब्द की आवृत्ति (दोहराव) से बनने वाले
- घर-घर = हर घर
- दिनोंदिन = दिन पर दिन
- रातोंरात = रात ही रात में
- हाथोंहाथ = हाथ ही हाथ में
- बीचोंबीच = ठीक बीच में
- धीरे-धीरे = धीरे के बाद धीरे
- गाँव-गाँव = हर गाँव
2. तत्पुरुष समास
जिस कारक का चिह्न लुप्त होता है, उसी के नाम पर उपभेद होता है। कर्ता और संबोधन कारक में तत्पुरुष नहीं होता, इसलिए कारक के आधार पर छह उपभेद हैं:
| उपभेद | लुप्त चिह्न | उदाहरण |
|---|---|---|
| कर्म तत्पुरुष | को | स्वर्गप्राप्त, गगनचुंबी |
| करण तत्पुरुष | से, के द्वारा (साधन) | तुलसीकृत, हस्तलिखित |
| संप्रदान तत्पुरुष | के लिए | रसोईघर, देशभक्ति |
| अपादान तत्पुरुष | से (अलग होना) | पथभ्रष्ट, देशनिकाला |
| संबंध तत्पुरुष | का, के, की | राजपुत्र, गंगाजल |
| अधिकरण तत्पुरुष | में, पर | वनवास, घुड़सवार |
कर्म तत्पुरुष (को)
- स्वर्गप्राप्त = स्वर्ग को प्राप्त
- यशप्राप्त = यश को प्राप्त
- गगनचुंबी = गगन को चूमने वाला
- शरणागत = शरण को आया हुआ
- ग्रामगत = ग्राम को गया हुआ
- चिड़ीमार = चिड़ियों को मारने वाला
- जेबकतरा = जेब को कतरने वाला
- मरणासन्न = मरण को पहुँचा हुआ
करण तत्पुरुष (से, के द्वारा)
- तुलसीकृत = तुलसी द्वारा कृत (रचित)
- हस्तलिखित = हस्त (हाथ) से लिखित
- रेखांकित = रेखा से अंकित
- मनमाना = मन से माना हुआ
- शोकाकुल = शोक से आकुल
- रसभरा = रस से भरा
- भुखमरा = भूख से मरा
- कष्टसाध्य = कष्ट से साध्य
संप्रदान तत्पुरुष (के लिए)
- रसोईघर = रसोई के लिए घर
- देशभक्ति = देश के लिए भक्ति
- गुरुदक्षिणा = गुरु के लिए दक्षिणा
- सत्याग्रह = सत्य के लिए आग्रह
- डाकगाड़ी = डाक के लिए गाड़ी
- हथकड़ी = हाथ के लिए कड़ी
- विद्यालय = विद्या के लिए आलय
- युद्धभूमि = युद्ध के लिए भूमि
अपादान तत्पुरुष (से — अलग होना)
- पथभ्रष्ट = पथ से भ्रष्ट
- देशनिकाला = देश से निकाला
- धनहीन = धन से हीन
- जन्मांध = जन्म से अंधा
- रोगमुक्त = रोग से मुक्त
- ऋणमुक्त = ऋण से मुक्त
- पदच्युत = पद से च्युत
- जलहीन = जल से हीन
संबंध तत्पुरुष (का, के, की)
- राजपुत्र = राजा का पुत्र
- गंगाजल = गंगा का जल
- राष्ट्रपति = राष्ट्र का पति
- सेनापति = सेना का पति
- देवालय = देव का आलय
- घुड़दौड़ = घोड़ों की दौड़
- लखपति = लाखों का पति
- राजमहल = राजा का महल
- पराधीन = पर के अधीन
- विद्यासागर = विद्या का सागर
अधिकरण तत्पुरुष (में, पर)
- वनवास = वन में वास
- नगरवास = नगर में वास
- जलमग्न = जल में मग्न
- आपबीती = आप पर बीती
- घुड़सवार = घोड़े पर सवार
- आत्मनिर्भर = आत्म पर निर्भर
- पुरुषोत्तम = पुरुषों में उत्तम
- कविश्रेष्ठ = कवियों में श्रेष्ठ
- दानवीर = दान में वीर
- ध्यानमग्न = ध्यान में मग्न
तत्पुरुष के अन्य उपभेद
नञ् तत्पुरुष — पहला पद निषेध या अभाव बताता है (अ, अन, न, ना, गैर, बे…)। विग्रह में "न" या "नहीं" आता है:
- असत्य = न सत्य
- अनादि = न आदि
- अनंत = न अंत
- असंभव = न संभव
- अधर्म = न धर्म
- अज्ञान = न ज्ञान
- अनपढ़ = न पढ़ा हुआ
- नापसंद = न पसंद
- नालायक = न लायक
- गैरहाज़िर = न हाज़िर
उपपद तत्पुरुष — उत्तरपद ऐसा कृदंत अंश होता है जो अकेले शब्द के रूप में प्रयोग नहीं होता (ज, कार, स्थ, चर, ज्ञ, द आदि):
- जलज = जल में जन्म लेने वाला (कमल)
- पंकज = पंक (कीचड़) में जन्म लेने वाला
- कुंभकार = कुंभ (घड़ा) बनाने वाला
- चर्मकार = चर्म का काम करने वाला
- तटस्थ = तट पर स्थित
- गृहस्थ = गृह में स्थित (रहने वाला)
- नभचर = नभ में चरने (विचरने) वाला
- सर्वज्ञ = सब कुछ जानने वाला
अलुक् तत्पुरुष — विभक्ति का लोप नहीं होता, वह समस्त पद में बनी रहती है:
- युधिष्ठिर = युद्ध में स्थिर रहने वाला
- मनसिज = मन में जन्म लेने वाला (कामदेव)
- सरसिज = सरोवर में जन्म लेने वाला (कमल)
- वाचस्पति = वाणी का पति
3. कर्मधारय समास
(क) विशेषण–विशेष्य ("है जो")
- नीलकमल = नीला है जो कमल
- महादेव = महान है जो देव
- सज्जन = सत् (अच्छा) है जो जन
- परमानंद = परम है जो आनंद
- महापुरुष = महान है जो पुरुष
- नवयुवक = नव है जो युवक
- पीतांबर = पीत (पीला) है जो अंबर
- कालापानी = काला है जो पानी
- अधमरा = आधा है जो मरा
- सद्गुण = सत् है जो गुण
(ख) उपमान–उपमेय ("के समान")
- चंद्रमुख = चंद्र के समान मुख
- कमलनयन = कमल के समान नयन
- मृगनयनी = मृग के समान नयनों वाली
- घनश्याम = घन (बादल) के समान श्याम
- कुसुमकोमल = कुसुम के समान कोमल
- वज्रदेह = वज्र के समान देह
(ग) रूपक ("रूपी")
- विद्याधन = विद्या रूपी धन
- भवसागर = भव (संसार) रूपी सागर
- करकमल = कर (हाथ) रूपी कमल
- चरणकमल = चरण रूपी कमल
- ज्ञानदीप = ज्ञान रूपी दीप
- क्रोधाग्नि = क्रोध रूपी अग्नि
4. द्विगु समास
- त्रिलोक = तीन लोकों का समूह
- त्रिभुवन = तीन भुवनों का समूह
- चौराहा = चार राहों का समूह
- चौमासा = चार मासों का समूह
- पंचवटी = पाँच वटों (बरगदों) का समूह
- सप्ताह = सात दिनों का समूह
- सप्तर्षि = सात ऋषियों का समूह
- नवरात्र = नौ रातों का समूह
- नवग्रह = नौ ग्रहों का समूह
- शताब्दी = सौ अब्दों (वर्षों) का समूह
- दोपहर = दो पहरों का समाहार
- अठन्नी = आठ आनों का समाहार
- त्रिफला = तीन फलों का समूह
- पंचतत्त्व = पाँच तत्त्वों का समूह
5. द्वंद्व समास
(क) इतरेतर द्वंद्व ("और")
- माता-पिता = माता और पिता
- राम-लक्ष्मण = राम और लक्ष्मण
- भाई-बहन = भाई और बहन
- राधा-कृष्ण = राधा और कृष्ण
- दिन-रात = दिन और रात
- गाय-भैंस = गाय और भैंस
- सुख-दुःख = सुख और दुःख
(ख) समाहार द्वंद्व (साथ में "आदि" का भाव)
- दाल-रोटी = दाल, रोटी आदि (भोजन)
- हाथ-पाँव = हाथ, पाँव आदि (शरीर)
- कपड़े-लत्ते = कपड़े, लत्ते आदि
- घर-द्वार = घर, द्वार आदि
- नहाया-धोया = नहाया, धोया आदि
(ग) वैकल्पिक द्वंद्व ("या", "अथवा")
- पाप-पुण्य = पाप या पुण्य
- धर्माधर्म = धर्म या अधर्म
- भला-बुरा = भला या बुरा
- थोड़ा-बहुत = थोड़ा या बहुत
- हानि-लाभ = हानि या लाभ
- ठंडा-गरम = ठंडा या गरम
- दो-चार = दो या चार
6. बहुव्रीहि समास
- दशानन = दस हैं आनन (मुख) जिसके, अर्थात् रावण
- लंबोदर = लंबा है उदर जिसका, अर्थात् गणेश
- गजानन = गज का-सा आनन है जिसका, अर्थात् गणेश
- एकदंत = एक है दाँत जिसका, अर्थात् गणेश
- नीलकंठ = नीला है कंठ जिसका, अर्थात् शिव
- त्रिलोचन = तीन हैं लोचन जिसके, अर्थात् शिव
- चंद्रशेखर = चंद्र है शिखर (मस्तक) पर जिसके, अर्थात् शिव
- मृत्युंजय = मृत्यु को जीत लिया है जिसने, अर्थात् शिव
- चक्रपाणि = चक्र है पाणि (हाथ) में जिसके, अर्थात् विष्णु
- चतुर्भुज = चार हैं भुजाएँ जिसकी, अर्थात् विष्णु
- पीतांबर = पीले हैं वस्त्र जिसके, अर्थात् कृष्ण
- गिरिधर = गिरि को धारण किया है जिसने, अर्थात् कृष्ण
- मुरलीधर = मुरली धारण करता है जो, अर्थात् कृष्ण
- वीणापाणि = वीणा है पाणि में जिसके, अर्थात् सरस्वती
- हंसवाहिनी = हंस है वाहन जिसका, अर्थात् सरस्वती
- षडानन = छह हैं आनन जिसके, अर्थात् कार्तिकेय
- महात्मा = महान है आत्मा जिसकी, ऐसा व्यक्ति
- दिगंबर = दिशाएँ ही हैं अंबर (वस्त्र) जिसके, अर्थात् शिव / जैन मुनि
- कुशाग्रबुद्धि = कुश के अग्रभाग जैसी तीखी है बुद्धि जिसकी, ऐसा व्यक्ति
- सुलोचना = सुंदर हैं लोचन जिसके, ऐसी स्त्री
एक शब्द, दो समास
कई शब्दों में विग्रह बदलने से समास बदल जाता है। परीक्षा में यही सबसे ज़्यादा उलझाता है। नियम सीधा है: विग्रह शब्द का शाब्दिक अर्थ बताए तो कर्मधारय/द्विगु/तत्पुरुष; किसी तीसरे का नाम बताए तो बहुव्रीहि।
| शब्द | विग्रह 1 → समास | विग्रह 2 → समास |
|---|---|---|
| पीतांबर | पीला है जो अंबर → कर्मधारय | पीले हैं अंबर जिसके, अर्थात् कृष्ण → बहुव्रीहि |
| नीलकंठ | नीला है जो कंठ → कर्मधारय | नीला है कंठ जिसका, अर्थात् शिव → बहुव्रीहि |
| लंबोदर | लंबा है जो उदर → कर्मधारय | लंबा है उदर जिसका, अर्थात् गणेश → बहुव्रीहि |
| महादेव | महान है जो देव → कर्मधारय | महान है देव जो, अर्थात् शिव → बहुव्रीहि |
| घनश्याम | घन के समान श्याम → कर्मधारय | घन के समान श्याम है जो, अर्थात् कृष्ण → बहुव्रीहि |
| चतुर्भुज | चार भुजाओं का समूह (आकृति) → द्विगु | चार हैं भुजाएँ जिसकी, अर्थात् विष्णु → बहुव्रीहि |
| त्रिलोचन | तीन लोचनों का समूह → द्विगु | तीन हैं लोचन जिसके, अर्थात् शिव → बहुव्रीहि |
| दशानन | दस आननों का समूह → द्विगु | दस हैं आनन जिसके, अर्थात् रावण → बहुव्रीहि |
समास बनाम संधि, और भेदों में अंतर
| अंतर | पहला | दूसरा |
|---|---|---|
| संधि बनाम समास | संधि: वर्णों का मेल, ध्वनि बदलती है (विद्या + आलय = विद्यालय) | समास: शब्दों का मेल, बीच के चिह्न हटते हैं (विद्या के लिए आलय = विद्यालय) |
| संधि-विच्छेद बनाम विग्रह | संधि-विच्छेद में लगाते हैं: हिम + आलय | विग्रह में पूरा अर्थ लिखते हैं: हिम का आलय |
| कर्मधारय बनाम बहुव्रीहि | कर्मधारय: उत्तरपद प्रधान, अर्थ शाब्दिक (नीला कंठ) | बहुव्रीहि: तीसरा पद प्रधान, अर्थ किसी और का (शिव) |
| द्विगु बनाम बहुव्रीहि | द्विगु: संख्या + समूह (चौराहा = चार राहों का समूह) | बहुव्रीहि: संख्या + तीसरे का बोध (चतुर्भुज = विष्णु) |
| द्विगु बनाम कर्मधारय | द्विगु: पूर्वपद संख्या, अर्थ समूह | कर्मधारय: पूर्वपद गुणवाचक विशेषण (नीलकमल) |
| अव्ययीभाव बनाम द्वंद्व | अव्ययीभाव: एक ही शब्द दोहराया (घर-घर) | द्वंद्व: दो अलग शब्द (माता-पिता) |
योजक चिह्न (-) कब लगाएँ
भारत सरकार के केंद्रीय हिंदी निदेशालय के मानक नियमों के अनुसार:
- द्वंद्व समास में दोनों पदों के बीच योजक चिह्न लगता है: माता-पिता, लेन-देन, खाना-पीना, चाल-चलन।
- तत्पुरुष समास सामान्यतः मिलाकर लिखा जाता है, बिना योजक चिह्न के: राजकुमार, गंगाजल, रामराज्य। योजक चिह्न केवल वहाँ लगाते हैं जहाँ उसके बिना अर्थ में भ्रम हो।
- अव्ययीभाव के प्रति, यथा जैसे शब्दों से बने पद मिलाकर लिखे जाते हैं: प्रतिदिन, यथासमय।
बार-बार पूछे जाने वाले शब्द
इन शब्दों को समास के भेद के साथ याद कर लें। ऊपर के उदाहरणों के अलावा कुछ और महत्वपूर्ण शब्द:
| समास | शब्द |
|---|---|
| अव्ययीभाव | यथाविधि, यथार्थ, प्रत्यक्ष (अक्षि के प्रति), आमरण, यथेष्ट, बेकाम, बखूबी, प्रतिवर्ष, साफ़-साफ़ |
| तत्पुरुष | हवनसामग्री, पुस्तकालय, राहखर्च, स्नानघर, मालगाड़ी, ग्रंथकार, राजकुमार, मृगछौना, अछूत, अनाथ, शरणार्थी, प्रेमाश्रु, देवदत्त, कामचोर |
| कर्मधारय | नीलगाय, महाराज, कापुरुष, नराधम, लालटोपी, कमलमुख, पुरुषसिंह, प्राणप्रिय, संसारसागर |
| द्विगु | त्रिकोण, षट्कोण, पंचामृत, दुराहा, तिराहा, चवन्नी, सतसई, नवनिधि, पंचपात्र, चौपाई |
| द्वंद्व | अन्न-जल, रुपया-पैसा, आगे-पीछे, ऊँच-नीच, आना-जाना, सीता-राम, देश-विदेश, लोटा-डोरी, यश-अपयश |
| बहुव्रीहि | चतुरानन (ब्रह्मा), पंचानन (शिव), शूलपाणि (शिव), पवनपुत्र (हनुमान), लंकेश (रावण), वज्रपाणि (इंद्र), सहस्राक्ष (इंद्र), मीनकेतु (कामदेव), अजातशत्रु, निर्धन, बारहसिंगा |
अभ्यास प्रश्न
उत्तर देखने के लिए "उत्तर देखें" पर टैप करें।
"यथाशक्ति" में कौन-सा समास है?
- (क) तत्पुरुष
- (ख) अव्ययीभाव
- (ग) द्विगु
- (घ) बहुव्रीहि
उत्तर देखें
(ख) शक्ति के अनुसार — पहला पद "यथा" अव्यय और प्रधान है।
"राजपुत्र" का सही विग्रह है —
- (क) राजा और पुत्र
- (ख) राजा के लिए पुत्र
- (ग) राजा का पुत्र
- (घ) राजा है जो पुत्र
उत्तर देखें
(ग) राजा का पुत्र — संबंध तत्पुरुष।
"हस्तलिखित" किस तत्पुरुष का उदाहरण है?
- (क) करण
- (ख) कर्म
- (ग) अपादान
- (घ) अधिकरण
उत्तर देखें
(क) हाथ से (हाथ के द्वारा) लिखित — "से" साधन के अर्थ में, इसलिए करण।
"पथभ्रष्ट" में कौन-सा तत्पुरुष है?
- (क) करण
- (ख) संप्रदान
- (ग) संबंध
- (घ) अपादान
उत्तर देखें
(घ) पथ से भ्रष्ट — "से" अलग होने के अर्थ में, अपादान तत्पुरुष।
"रसोईघर" का विग्रह क्या होगा?
- (क) रसोई का घर
- (ख) रसोई के लिए घर
- (ग) रसोई में घर
- (घ) रसोई और घर
उत्तर देखें
(ख) रसोई के लिए घर — संप्रदान तत्पुरुष।
"नीलकमल" में कौन-सा समास है?
- (क) कर्मधारय
- (ख) द्विगु
- (ग) बहुव्रीहि
- (घ) द्वंद्व
उत्तर देखें
(क) नीला है जो कमल — विशेषण-विशेष्य, कर्मधारय।
"चंद्रमुख" का सही विग्रह है —
- (क) चंद्र का मुख
- (ख) चंद्र के समान मुख
- (ग) चंद्र और मुख
- (घ) चंद्र है मुख जिसका
उत्तर देखें
(ख) चंद्र के समान मुख — उपमान-उपमेय, कर्मधारय।
"चौराहा" में कौन-सा समास है?
- (क) बहुव्रीहि
- (ख) तत्पुरुष
- (ग) द्विगु
- (घ) अव्ययीभाव
उत्तर देखें
(ग) चार राहों का समूह — पहला पद संख्या, अर्थ समूह: द्विगु।
"माता-पिता" में कौन-सा समास है?
- (क) तत्पुरुष
- (ख) द्वंद्व
- (ग) कर्मधारय
- (घ) अव्ययीभाव
उत्तर देखें
(ख) माता और पिता — दोनों पद प्रधान, इतरेतर द्वंद्व।
"पाप-पुण्य" किस द्वंद्व का उदाहरण है?
- (क) इतरेतर
- (ख) समाहार
- (ग) वैकल्पिक
- (घ) यह द्वंद्व नहीं है
उत्तर देखें
(ग) पाप या पुण्य — "या" से जुड़ा, वैकल्पिक द्वंद्व।
"दशानन" में कौन-सा समास है (सामान्य अर्थ में)?
- (क) बहुव्रीहि
- (ख) द्विगु
- (ग) कर्मधारय
- (घ) तत्पुरुष
उत्तर देखें
(क) दस हैं आनन जिसके, अर्थात् रावण — तीसरे पद का बोध, बहुव्रीहि।
"लंबोदर" का बहुव्रीहि विग्रह कौन-सा है?
- (क) लंबा है जो उदर
- (ख) लंबे उदर का समूह
- (ग) लंबा है उदर जिसका, अर्थात् गणेश
- (घ) लंबा और उदर
उत्तर देखें
(ग) "अर्थात् गणेश" — तीसरे का बोध होने से बहुव्रीहि। "लंबा है जो उदर" कर्मधारय होता।
"पीतांबर" को कर्मधारय मानने पर विग्रह होगा —
- (क) पीला है जो अंबर
- (ख) पीले हैं वस्त्र जिसके, अर्थात् कृष्ण
- (ग) पीला और अंबर
- (घ) पीले वस्त्रों का समूह
उत्तर देखें
(क) पीला है जो अंबर — शाब्दिक अर्थ, विशेषण-विशेष्य: कर्मधारय।
"घर-घर" में कौन-सा समास है?
- (क) द्वंद्व
- (ख) अव्ययीभाव
- (ग) तत्पुरुष
- (घ) कर्मधारय
उत्तर देखें
(ख) एक ही शब्द की आवृत्ति, पूरा पद अव्यय की तरह (हर घर) — अव्ययीभाव।
"असत्य" में कौन-सा समास है?
- (क) नञ् तत्पुरुष
- (ख) बहुव्रीहि
- (ग) कर्मधारय
- (घ) अव्ययीभाव
उत्तर देखें
(क) न सत्य — निषेध, नञ् तत्पुरुष।
"पंकज" (केवल "पंक में जन्म लेने वाला") में कौन-सा समास है?
- (क) कर्मधारय
- (ख) द्वंद्व
- (ग) उपपद तत्पुरुष
- (घ) द्विगु
उत्तर देखें
(ग) उत्तरपद "ज" अकेले प्रयोग नहीं होता — उपपद तत्पुरुष। "अर्थात् कमल" जोड़ने पर बहुव्रीहि माना जाता है।
"त्रिलोक" का सही विग्रह है —
- (क) तीन लोक हैं जिसके
- (ख) तीन लोकों का समूह
- (ग) तीन और लोक
- (घ) तीन के लिए लोक
उत्तर देखें
(ख) तीन लोकों का समूह — द्विगु।
"विद्यालय" में संधि और समास क्रमशः हैं —
- (क) गुण, कर्मधारय
- (ख) दीर्घ, तत्पुरुष
- (ग) दीर्घ, बहुव्रीहि
- (घ) यण, तत्पुरुष
उत्तर देखें
(ख) विद्या + आलय = दीर्घ संधि; विद्या के लिए आलय = संप्रदान तत्पुरुष।
"नीलकंठ" शिव के अर्थ में किस समास का उदाहरण है?
- (क) कर्मधारय
- (ख) तत्पुरुष
- (ग) द्विगु
- (घ) बहुव्रीहि
उत्तर देखें
(घ) नीला है कंठ जिसका, अर्थात् शिव — बहुव्रीहि।
किस समास में दोनों पद प्रधान होते हैं?
- (क) तत्पुरुष
- (ख) बहुव्रीहि
- (ग) द्वंद्व
- (घ) कर्मधारय
उत्तर देखें
(ग) द्वंद्व में दोनों पद प्रधान; बहुव्रीहि में कोई नहीं; तत्पुरुष और कर्मधारय में उत्तरपद।
संदर्भ
ये नोट्स हमने अपने शब्दों में लिखे हैं। नियमों और उदाहरणों का मिलान इन मानक स्रोतों से किया गया है:
- केंद्रीय हिंदी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार — देवनागरी लिपि एवं हिंदी वर्तनी का मानकीकरण (संशोधित संस्करण, 2024), अनुच्छेद 3.4: योजक चिह्न