झारज्ञान

पत्र 1 · हिंदी भाषा ज्ञान · अध्याय 1

वर्ण विचार और वर्तनी

हिंदी की ध्वनियाँ, उनका वर्गीकरण और सही वर्तनी। परीक्षा में वर्णों की संख्या, उच्चारण-स्थान, घोष-अघोष और 'शुद्ध वर्तनी वाला शब्द चुनिए' जैसे प्रश्न सबसे ज़्यादा आते हैं।

अंतिम अपडेट: 2026-10-14

इस अध्याय में
  1. भाषा, लिपि, वर्ण और वर्णमाला
  2. मानक हिंदी वर्णमाला: कितने वर्ण?
  3. स्वर और उसके भेद
  4. मात्राएँ
  5. व्यंजन और उसके भेद
  6. अल्पप्राण-महाप्राण, घोष-अघोष
  7. उच्चारण-स्थान
  8. अनुस्वार, चंद्रबिंदु, विसर्ग, हल्
  9. संयुक्त व्यंजन और र के रूप
  10. मानक वर्तनी के नियम
  11. अशुद्ध-शुद्ध शब्दों की सूची
  12. अभ्यास प्रश्न

भाषा, लिपि, वर्ण और वर्णमाला

वर्ण-विच्छेद किसी शब्द को उसके सभी वर्णों में तोड़ना वर्ण-विच्छेद है। हर व्यंजन के साथ छिपा स्वर अलग लिखें: कमल = क् + अ + म् + अ + ल् + अ। "विद्या" = व् + इ + द् + य् + आ। "क्षमा" = क् + ष् + अ + म् + आ।

मानक हिंदी वर्णमाला: कितने वर्ण?

भारत सरकार के केंद्रीय हिंदी निदेशालय के मानक (2024) के अनुसार:

वर्गवर्णसंख्या
स्वरअ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ11
अयोगवाह (स्वर के साथ लिखे जाते हैं, पर स्वर नहीं गिने जाते)अं (अनुस्वार), अः (विसर्ग)2
मूल व्यंजनक से ह तक (स्पर्श 25 + अंतःस्थ 4 + ऊष्म 4)33
संयुक्त व्यंजनक्ष त्र ज्ञ श्र4
उत्क्षिप्त (द्विगुण) व्यंजनड़ ढ़2
विशेष व्यंजनळ (हरियाणवी, मराठी आदि के लिए)1
"हिंदी वर्णमाला में कितने वर्ण हैं?" — उत्तर विकल्पों पर निर्भर मूल स्वर 11 + मूल व्यंजन 33 = 44। इनमें अं, अः जोड़ें तो 46; फिर क्ष, त्र, ज्ञ, श्र जोड़ें तो 50; फिर ड़, ढ़ जोड़ें तो 52। मानक में ळ भी है, जिससे व्यंजन कुल 40 हो जाते हैं। परीक्षा में प्रायः स्वर 11, मूल व्यंजन 33, कुल व्यंजन 39 (33 + 4 संयुक्त + 2 उत्क्षिप्त) और कुल वर्ण 52 पूछे जाते हैं — प्रश्न की भाषा ध्यान से पढ़ें।

आगत ध्वनियाँ: अंग्रेज़ी शब्दों के लिए ऑ (कॉलेज, डॉक्टर) और उर्दू-फ़ारसी के लिए नुक्ता वाले क़ ख़ ग़ ज़ फ़ प्रयोग होते हैं। मानक के अनुसार हिंदी में घुल-मिल चुके उर्दू शब्द बिना नुक्ते के लिखे जा सकते हैं (कलम, किला); ये मूल वर्णमाला का हिस्सा नहीं हैं।

स्वर और उसके भेद

जिन वर्णों का उच्चारण बिना किसी दूसरे वर्ण की सहायता के होता है और जिनके बोलते समय हवा मुँह से बिना रुकावट निकलती है, वे स्वर हैं। हिंदी में 11 स्वर हैं।

1. उच्चारण-काल (मात्रा) के आधार पर

भेदअर्थस्वर
ह्रस्व स्वर (एकमात्रिक)सबसे कम समयअ इ उ ऋ — 4
दीर्घ स्वर (द्विमात्रिक)ह्रस्व से दुगना समयआ ई ऊ ए ऐ ओ औ — 7
प्लुत स्वर (त्रिमात्रिक)तीन गुना समय; पुकारने या मंत्र मेंओ३म्, राऽऽम — चिह्न ३ या ऽ

2. उत्पत्ति (बनावट) के आधार पर

भेदअर्थस्वर
मूल स्वरजो किसी दूसरे स्वर से नहीं बनेअ इ उ ऋ
सजातीय/सवर्ण दीर्घएक ही स्वर को दुगना करने सेआ (अ+अ), ई (इ+इ), ऊ (उ+उ)
संयुक्त (संधि) स्वरदो भिन्न स्वरों के मेल सेए (अ+इ), ऐ (अ+ए), ओ (अ+उ), औ (अ+ओ)

3. जीभ के प्रयोग के आधार पर

भेदस्वर
अग्र स्वर (जीभ का अगला भाग)इ ई ए ऐ
मध्य स्वर (जीभ का बीच का भाग)अ
पश्च स्वर (जीभ का पिछला भाग)आ उ ऊ ओ औ

4. होंठों की आकृति के आधार पर

वृत्ताकार (गोलाकार) स्वर — होंठ गोल होते हैं: उ ऊ ओ औ। अवृत्ताकार स्वर — होंठ गोल नहीं होते: अ आ इ ई ए ऐ।

5. मुख-द्वार के खुलने के आधार पर

भेदस्वर
विवृत (पूरा खुला)आ
अर्धविवृत (आधा खुला)अ ऐ औ
अर्धसंवृत (आधा बंद)ए ओ
संवृत (लगभग बंद)इ ई उ ऊ

6. नाक से हवा निकलने के आधार पर

निरनुनासिक — केवल मुँह से: अ, आ, इ। अनुनासिक — मुँह और नाक दोनों से; चंद्रबिंदु (ँ) से लिखे जाते हैं: अँ, आँ, इँ (आँख, माँ, हँसना)।

7. सवर्ण और असवर्ण

एक ही उच्चारण-स्थान वाले स्वर सवर्ण (सजातीय) हैं: अ-आ, इ-ई, उ-ऊ। भिन्न स्थान वाले असवर्ण: अ-इ, उ-ए। संधि में "सवर्ण" शब्द इसी अर्थ में आता है (दीर्घ संधि = सवर्ण स्वरों का मेल)।

मात्राएँ

व्यंजन के साथ जुड़ने पर स्वर का जो चिह्न लगता है, वह मात्रा है। "अ" की कोई मात्रा नहीं होती — हर व्यंजन में "अ" पहले से रहता है (क = क् + अ)।

स्वरमात्राउदाहरण
आाका
इिकि
ईीकी
उुकु
ऊूकू
ऋृकृ
एेके
ऐैकै
ओोको
औौकौ
र के साथ उ, ऊ की मात्रा र के साथ उ और ऊ की मात्रा नीचे न लगकर बगल में लगती है: रु (रुपया), रू (रूप)। "रूपया" या "रुप" लिखना गलत है।

व्यंजन और उसके भेद

जिन वर्णों का उच्चारण स्वर की सहायता से होता है, वे व्यंजन हैं। हर व्यंजन में "अ" मिला रहता है; बिना स्वर के व्यंजन लिखना हो तो नीचे हल् चिह्न (्) लगाते हैं: क्, म्।

1. स्पर्श व्यंजन (25)

जीभ मुँह के किसी भाग को छूकर हवा रोकती है। पाँच वर्ग, हर वर्ग में पाँच वर्ण, और वर्ग का नाम पहले वर्ण से:

वर्गवर्णउच्चारण-स्थान
क वर्गक ख ग घ ङकंठ
च वर्गच छ ज झ ञतालु
ट वर्गट ठ ड ढ णमूर्धा
त वर्गत थ द ध नदंत
प वर्गप फ ब भ मओष्ठ

2. अंतःस्थ व्यंजन (4): य र ल व

इनका उच्चारण स्वर और व्यंजन के बीच का होता है। य, व को अर्धस्वर कहते हैं; र को लुंठित (प्रकंपित) — जीभ काँपती है; ल को पार्श्विक — हवा जीभ के बगल से निकलती है।

3. ऊष्म (संघर्षी) व्यंजन (4): श ष स ह

उच्चारण में हवा रगड़ खाकर निकलती है और गर्माहट-सी पैदा होती है।

4. उत्क्षिप्त (द्विगुण) व्यंजन: ड़ ढ़

जीभ ऊपर उठकर झटके से नीचे गिरती है। ड़, ढ़ शब्द के आरंभ में नहीं आते: सड़क, पढ़ना, बढ़ई। शब्द के शुरू में हमेशा ड, ढ (डर, ढक्कन)।

5. नासिक्य (अनुनासिक) व्यंजन: ङ ञ ण न म

हर वर्ग का पाँचवाँ वर्ण; उच्चारण में हवा नाक से भी निकलती है। इन्हें पंचमाक्षर भी कहते हैं।

6. उच्चारण के तरीके (प्रयत्न) के आधार पर एक नज़र में

भेदकैसेवर्ण
स्पर्शहवा पूरी रुककर छूटती हैक से म तक (च वर्ग छोड़कर)
स्पर्श-संघर्षीरुककर रगड़ के साथच छ ज झ
संघर्षीरगड़ के साथश ष स ह (और फ़, ज़)
नासिक्यनाक सेङ ञ ण न म
पार्श्विकजीभ के बगल सेल
लुंठित/प्रकंपितजीभ काँपती हैर
उत्क्षिप्तजीभ झटके से गिरती हैड़ ढ़
अर्धस्वरस्वर जैसेय व

अल्पप्राण-महाप्राण, घोष-अघोष

प्राण-वायु (साँस) के आधार पर

अल्पप्राण: मुँह से कम हवा निकलती है — हर वर्ग का पहला, तीसरा, पाँचवाँ वर्ण तथा य र ल व। (क ग ङ, च ज ञ, ट ड ण, त द न, प ब म, य र ल व)
महाप्राण: मुँह से अधिक हवा निकलती है ("ह" की ध्वनि मिली रहती है) — हर वर्ग का दूसरा, चौथा वर्ण तथा श ष स ह। (ख घ, छ झ, ठ ढ, थ ध, फ भ)

स्वरतंत्री (गले की कंपन) के आधार पर

अघोष: स्वरतंत्री में कंपन नहीं — हर वर्ग का पहला, दूसरा वर्ण तथा श ष स। (क ख, च छ, ट ठ, त थ, प फ, श ष स)
घोष (सघोष): स्वरतंत्री में कंपन — हर वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण, य र ल व ह, और सभी स्वर।
एक तालिका में याद करें वर्ग के पाँच वर्णों को 1-2-3-4-5 मानें: अल्पप्राण = 1, 3, 5 · महाप्राण = 2, 4 · अघोष = 1, 2 · घोष = 3, 4, 5। उदाहरण: "घ" = चौथा वर्ण → महाप्राण + घोष। "त" = पहला → अल्पप्राण + अघोष।
"ह" कहाँ है? ह महाप्राण भी है और घोष भी — जबकि बाकी ऊष्म (श ष स) महाप्राण और अघोष हैं। यह सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला अपवाद है।

उच्चारण-स्थान

मुँह के जिस भाग से वर्ण बोला जाता है, वह उसका उच्चारण-स्थान है। वर्गों के नाम (कंठ्य, तालव्य आदि) इसी से बने हैं।

स्थाननामवर्ण
कंठकंठ्यअ आ, क वर्ग (क ख ग घ ङ), ह, विसर्ग (ः)
तालुतालव्यइ ई, च वर्ग (च छ ज झ ञ), य, श
मूर्धामूर्धन्यऋ, ट वर्ग (ट ठ ड ढ ण), र, ष
दंतदंत्यत वर्ग (त थ द ध न), ल, स
ओष्ठओष्ठ्यउ ऊ, प वर्ग (प फ ब भ म)
नासिकानासिक्यङ ञ ण न म (अपने वर्ग-स्थान के साथ), अनुस्वार
कंठ + तालुकंठ-तालव्यए ऐ
कंठ + ओष्ठकंठोष्ठ्यओ औ
दंत + ओष्ठदंतोष्ठ्यव
संस्कृत का प्रसिद्ध सूत्र (याद रखने के लिए)"अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः" (अ, क वर्ग, ह, विसर्ग — कंठ) · "इचुयशानां तालु" (इ, च वर्ग, य, श — तालु) · "ऋटुरषाणां मूर्धा" (ऋ, ट वर्ग, र, ष — मूर्धा) · "लृतुलसानां दन्ताः" (त वर्ग, ल, स — दंत) · "उपूपध्मानीयानामोष्ठौ" (उ, प वर्ग — ओष्ठ)।
श, ष, स का भेद तीनों ऊष्म हैं, पर स्थान अलग: श — तालव्य, ष — मूर्धन्य, स — दंत्य। इसी तरह र — मूर्धन्य और ल — दंत्य।

अनुस्वार, चंद्रबिंदु, विसर्ग और हल्

अनुस्वार (ं)

स्वर के बाद आने वाली नासिक ध्वनि, जो अगले व्यंजन के वर्ग के पंचमाक्षर की तरह बोली जाती है। मानक नियम (केंद्रीय हिंदी निदेशालय):

चंद्रबिंदु / अनुनासिक (ँ)

स्वर का नाक से उच्चारण। तद्भव और देशज शब्दों में आता है: आँख, चाँद, दाँत, माँ, लड़कियाँ। जहाँ शिरोरेखा के ऊपर मात्रा हो (ि, ी, े, ै, ो, ौ), वहाँ जगह की कमी से चंद्रबिंदु की जगह केवल बिंदु लगता है: में, भैंस, नहीं, गोंद।

हंस और हँस चंद्रबिंदु न लगाने से अर्थ बदल सकता है: हंस (पक्षी) — हँस (हँसना); अंगना (स्त्री) — अँगना (आँगन)। ऐसे शब्दों में चंद्रबिंदु अनिवार्य है।

अनुस्वार बनाम अनुनासिक

अनुस्वार (ं)अनुनासिक (ँ)
क्या हैव्यंजन की तरह नासिक ध्वनिस्वर का नाक से उच्चारण
किन शब्दों मेंप्रायः तत्सम (संबंध, कंठ)प्रायः तद्भव/देशज (आँख, चाँद)
उच्चारणअगले वर्ण के पंचमाक्षर जैसा, ज़्यादा ज़ोरहल्की नासिकता

विसर्ग (ः)

स्वर के बाद आधे "ह" जैसी ध्वनि; केवल तत्सम शब्दों में: अतः, पुनः, प्रातः, दुःख। मानक के अनुसार हिंदी में घुले तद्भव रूप में विसर्ग हट जाता है: दुख-सुख।

अयोगवाह

अनुस्वार और विसर्ग न पूरी तरह स्वर हैं, न व्यंजन — ये हमेशा किसी स्वर के सहारे ही आते हैं, इसलिए इन्हें अयोगवाह कहते हैं।

हल् चिह्न (्)

स्वर-रहित व्यंजन दिखाता है। मानक के अनुसार हिंदी शब्दों के अंत में हल् प्रायः नहीं लिखा जाता (महान, राजन), पर संस्कृत अव्ययों में रहता है: अर्थात्, पश्चात्, किंचित्। संधि दिखाते समय भी लिखते हैं: जगत् + ईश।

संयुक्त व्यंजन, द्वित्व और र के रूप

र के चार रूप

रूपकबउदाहरण
रेफ (र्) — ऊपरर स्वर-रहित हो और बाद के व्यंजन से पहले आएधर्म, कर्म, सूर्य, आशीर्वाद
पदेन (्र) — नीचे तिरछापाई वाले व्यंजन के बाद रप्रकाश, क्रम, ग्राम
नीचे ^ जैसाबिना पाई वाले व्यंजन (ट, ड) के बाद रराष्ट्र, ड्रम, ट्रक
त्र, श्रत और श के साथ विशेष रूपत्रिशूल, श्रम
रेफ कहाँ लगेगा? रेफ उस व्यंजन के ऊपर लगता है जिसके पहले र बोला जाता है: आशीर्वाद (आ-शीर्-वाद) — "आर्शीवाद" गलत। कार्यक्रम, पूर्ण, निर्माण, सूर्य।

मानक वर्तनी के नियम

केंद्रीय हिंदी निदेशालय के मानक (2024) के मुख्य नियम, जो "शुद्ध वाक्य/शुद्ध शब्द" वाले प्रश्नों का आधार हैं:

  1. विभक्ति-चिह्न संज्ञा से अलग, सर्वनाम से मिलाकर: राम ने, राम को — पर उसने, तुमसे, मुझको। सर्वनाम के साथ दो चिह्न हों तो पहला मिलाकर, दूसरा अलग: उसके लिए, आपके लिए। बीच में "ही/तक" आए तो अलग: आप ही के लिए।
  2. संयुक्त क्रिया के हिस्से अलग: पढ़ा करता है, जा सकता है। पर पूर्वकालिक "कर" मिलाकर: पाकर, करके, रो-रोकर।
  3. तक, साथ अलग: यहाँ तक, आपके साथ। "वाला" संज्ञा के साथ मिलाकर (दूधवाला) पर क्रिया के बाद अलग (जाने वाला)।
  4. श्रुतिमूलक य, व: क्रिया में स्वर रूप — गया, गई, गए; विशेषण/संज्ञा में य रूप — नया, नयी, नये।
  5. ऑ अंग्रेज़ी शब्दों में: कॉलेज, हॉल, ऑफ़िस।
  6. संस्कृत के शब्द मूल वर्तनी में: महत्त्व, तत्त्व, सत्त्व (महत्व, तत्व नहीं)।
  7. पूर्ण विराम के लिए खड़ी पाई (।); बाकी विराम-चिह्न अंग्रेज़ी वाले।

वर्तनी की गलतियों के पीछे के 6 नियम

1. -इक प्रत्यय से पहला स्वर बढ़ता है (वृद्धि): समाज → सामाजिक · इतिहास → ऐतिहासिक · व्यवहार → व्यावहारिक · संसार → सांसारिक · प्रमाण → प्रामाणिक · उद्योग → औद्योगिक · वर्ष → वार्षिक · धर्म → धार्मिक।
2. भाववाचक पर दोबारा -ता नहीं: सौंदर्य (सौंदर्यता नहीं), गौरव (गौरवता नहीं), माधुर्य (माधुर्यता नहीं), ऐक्य (ऐक्यता नहीं) — "य" वाले भाववाचक में -ता नहीं जुड़ता।
3. -इन्/-ई वाले शब्द समास में इ हो जाते हैं: मंत्री → मंत्रिमंडल · स्वामी → स्वामिभक्त · प्राणी → प्राणिमात्र · योगी → योगिराज।
4. स्त्रीलिंग -इत्री/-यित्री: कवि → कवयित्री (कवियत्री नहीं) · रचना → रचयिता (रचियता नहीं)।
5. ऋ और र का भ्रम: गृह, गृहिणी, अनुगृहीत, शृंगार, शृंखला, दृष्टि (ऋ की मात्रा) — पर द्रष्टा, स्रष्टा, स्रोत (र, ऋ नहीं)।
6. संधि से वर्तनी: संधि-नियम जानने से वर्तनी अपने-आप ठीक होती है: उत् + ज्वल = उज्ज्वल, सम् + न्यास = संन्यास, अति + अधिक = अत्यधिक, उपरि + उक्त = उपर्युक्त, अन् + अधिकार = अनधिकार, दुः + अवस्था = दुरवस्था। (देखें: संधि)

अशुद्ध-शुद्ध शब्दों की सूची

परीक्षा में "शुद्ध वर्तनी वाला शब्द चुनिए" प्रश्नों में यही शब्द बार-बार आते हैं।

अशुद्धशुद्ध
आर्शीवादआशीर्वाद
उज्वलउज्ज्वल
कवियत्रीकवयित्री
रचियतारचयिता
सन्यासीसंन्यासी
अनाधिकारअनधिकार
उपरोक्तउपर्युक्त
सौंदर्यतासौंदर्य
पूज्यनीयपूजनीय
अहिल्याअहल्या
द्वारिकाद्वारका
प्रदर्शिनीप्रदर्शनी
आधीनअधीन
अध्यनअध्ययन
ज्योत्सनाज्योत्स्ना
दुरावस्थादुरवस्था
निरोगनीरोग
सम्राज्यसाम्राज्य
कृप्याकृपया
ब्रम्हब्रह्म
चिन्हचिह्न
स्त्रोतस्रोत
श्रृंगारशृंगार
श्रृंखलाशृंखला
परिक्षापरीक्षा
प्रमाणिकप्रामाणिक
व्यवहारिकव्यावहारिक
एतिहासिकऐतिहासिक
अतिथीअतिथि
मंत्रीमंडलमंत्रिमंडल
स्थाईस्थायी
अनुग्रहीतअनुगृहीत
ग्रहिणीगृहिणी
दृष्टाद्रष्टा
सृष्टास्रष्टा
अत्याधिकअत्यधिक
महत्वमहत्त्व
तत्वतत्त्व
शताब्दिशताब्दी
पुरुस्कारपुरस्कार
अंतर्ध्यानअंतर्धान
यथेष्ठयथेष्ट
संसारिकसांसारिक
औदोगिकऔद्योगिक
क्योंकीक्योंकि
बिमारीबीमारी
उन्नतीउन्नति
इसलियेइसलिए
गयी (क्रिया)गई
कृत्घनकृतघ्न
प्रज्ज्वलितप्रज्वलित
उत्तरदाईउत्तरदायी
आद्रआर्द्र
बुद्धवारबुधवार
धुम्रपानधूम्रपान
सप्ताहिकसाप्ताहिक
नेतिकतानैतिकता
वापिसवापस
अंताक्षरीअंत्याक्षरी
प्रतिछायाप्रतिच्छाया
उच्श्रृंखलउच्छृंखल
सम्मतीसम्मति
निरपराधीनिरपराध
सुस्वागतम्स्वागतम्
मिष्ठानमिष्टान्न
अक्षोहिणीअक्षौहिणी
श्रोत (स्रोत के अर्थ में)स्रोत
आजीवकाआजीविका
इन्द्राइंदिरा
विधालयविद्यालय
बहुमुल्यबहुमूल्य
उपलक्षउपलक्ष्य
सहस्त्रसहस्र
अत्यंताभाव ✓अत्यंताभाव
प्रविष्ठप्रविष्ट
घनिष्टघनिष्ठ
कनिष्टकनिष्ठ
श्रेष्टश्रेष्ठ
पुष्ठपुष्ट
निरिक्षणनिरीक्षण
उपाधीउपाधि
समिक्षासमीक्षा
प्रतिक्षाप्रतीक्षा
उद्धाटनउद्घाटन
दुसरादूसरा
अनूकूलअनुकूल
पूर्वान्हपूर्वाह्न
अपरान्हअपराह्न
मध्यान्हमध्याह्न
तदोपरांततदुपरांत
ईर्षाईर्ष्या
व्यस्कवयस्क
उष्माऊष्मा
ग्रहस्थीगृहस्थी
प्रस्तुतिकरणप्रस्तुतीकरण
सशक्तिकरणसशक्तीकरण
-ईकरण वाले शब्दजब किसी संज्ञा/विशेषण को "बनाना" का अर्थ दिया जाता है, तो अंत का अ/इ बदलकर ई होता है: सशक्त → सशक्तीकरण, प्रस्तुत → प्रस्तुतीकरण, सरल → सरलीकरण, शुद्ध → शुद्धीकरण। "सशक्तिकरण" गलत है।

अभ्यास प्रश्न

उत्तर देखने के लिए "उत्तर देखें" पर टैप करें।

  1. हिंदी की मानक वर्णमाला में स्वरों की संख्या है —

    1. (क) 10
    2. (ख) 11
    3. (ग) 12
    4. (घ) 13
    उत्तर देखें

    (ख) अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ — 11 स्वर (केंद्रीय हिंदी निदेशालय)।

  2. मूल व्यंजनों की संख्या कितनी है?

    1. (क) 25
    2. (ख) 35
    3. (ग) 39
    4. (घ) 33
    उत्तर देखें

    (घ) स्पर्श 25 + अंतःस्थ 4 + ऊष्म 4 = 33।

  3. "अनुस्वार" और "विसर्ग" को क्या कहा जाता है?

    1. (क) संयुक्त स्वर
    2. (ख) अयोगवाह
    3. (ग) उत्क्षिप्त
    4. (घ) अर्धस्वर
    उत्तर देखें

    (ख) ये स्वर के सहारे आते हैं, न पूरे स्वर न पूरे व्यंजन — अयोगवाह।

  4. इनमें से कौन-सा ह्रस्व स्वर है?

    1. (क) आ
    2. (ख) ए
    3. (ग) ऋ
    4. (घ) औ
    उत्तर देखें

    (ग) ह्रस्व स्वर: अ, इ, उ, ऋ।

  5. "ए" और "ऐ" का उच्चारण-स्थान है —

    1. (क) कंठ-तालु
    2. (ख) कंठोष्ठ
    3. (ग) तालु
    4. (घ) मूर्धा
    उत्तर देखें

    (क) ए, ऐ — कंठ-तालव्य; ओ, औ — कंठोष्ठ्य।

  6. "व" का उच्चारण-स्थान क्या है?

    1. (क) ओष्ठ
    2. (ख) दंत
    3. (ग) कंठ
    4. (घ) दंतोष्ठ
    उत्तर देखें

    (घ) व — दंतोष्ठ्य (ऊपर के दाँत और निचला होंठ)।

  7. "ष" किस वर्ग का वर्ण है (उच्चारण-स्थान के अनुसार)?

    1. (क) तालव्य
    2. (ख) मूर्धन्य
    3. (ग) दंत्य
    4. (घ) कंठ्य
    उत्तर देखें

    (ख) श तालव्य, ष मूर्धन्य, स दंत्य।

  8. इनमें से महाप्राण व्यंजन कौन-सा है?

    1. (क) ग
    2. (ख) ज
    3. (ग) थ
    4. (घ) न
    उत्तर देखें

    (ग) थ — त वर्ग का दूसरा वर्ण; दूसरा और चौथा वर्ण महाप्राण होता है।

  9. इनमें से अघोष व्यंजन कौन-सा है?

    1. (क) ग
    2. (ख) द
    3. (ग) प
    4. (घ) म
    उत्तर देखें

    (ग) प — प वर्ग का पहला वर्ण; पहला-दूसरा वर्ण अघोष।

  10. "ह" वर्ण है —

    1. (क) अल्पप्राण, अघोष
    2. (ख) महाप्राण, अघोष
    3. (ग) अल्पप्राण, घोष
    4. (घ) महाप्राण, घोष
    उत्तर देखें

    (घ) ह महाप्राण और घोष दोनों है — ऊष्म वर्णों में यह अपवाद है।

  11. "ड़" और "ढ़" किस प्रकार के व्यंजन हैं?

    1. (क) पार्श्विक
    2. (ख) उत्क्षिप्त
    3. (ग) लुंठित
    4. (घ) नासिक्य
    उत्तर देखें

    (ख) जीभ झटके से गिरती है — उत्क्षिप्त (द्विगुण); ये शब्द के आरंभ में नहीं आते।

  12. "ल" किस प्रकार का व्यंजन है?

    1. (क) पार्श्विक
    2. (ख) लुंठित
    3. (ग) संघर्षी
    4. (घ) अर्धस्वर
    उत्तर देखें

    (क) हवा जीभ के बगल से निकलती है — पार्श्विक।

  13. शुद्ध वर्तनी वाला शब्द चुनिए —

    1. (क) आर्शीवाद
    2. (ख) आशीर्वाद
    3. (ग) आशिर्वाद
    4. (घ) आर्शिवाद
    उत्तर देखें

    (ख) आ-शीर्-वाद: रेफ "व" पर लगेगा।

  14. शुद्ध शब्द कौन-सा है?

    1. (क) कवियत्री
    2. (ख) कवयत्री
    3. (ग) कवियित्री
    4. (घ) कवयित्री
    उत्तर देखें

    (घ) कवि का स्त्रीलिंग — कवयित्री।

  15. शुद्ध शब्द चुनिए —

    1. (क) उपरोक्त
    2. (ख) उपर्युक्त
    3. (ग) उपरियुक्त
    4. (घ) ऊपरोक्त
    उत्तर देखें

    (ख) उपरि + उक्त = उपर्युक्त (यण संधि)।

  16. "इतिहास" से -इक प्रत्यय लगाकर सही विशेषण होगा —

    1. (क) इतिहासिक
    2. (ख) एतिहासिक
    3. (ग) ऐतिहासिक
    4. (घ) ऐतहासिक
    उत्तर देखें

    (ग) -इक लगने पर पहला स्वर वृद्धि: इ → ऐ।

  17. मानक वर्तनी के अनुसार सही रूप है —

    1. (क) उस ने
    2. (ख) उसने
    3. (ग) उस-ने
    4. (घ) उसनें
    उत्तर देखें

    (ख) सर्वनाम के साथ विभक्ति मिलाकर लिखी जाती है।

  18. शुद्ध शब्द कौन-सा है?

    1. (क) सशक्तिकरण
    2. (ख) सशक्तीकरण
    3. (ग) सशक्तकरण
    4. (घ) सशक्तीकरन
    उत्तर देखें

    (ख) "बनाना" के अर्थ में -ईकरण: सशक्त → सशक्तीकरण।

  19. "हंस" और "हँस" में अंतर किस कारण है?

    1. (क) विसर्ग
    2. (ख) रेफ
    3. (ग) हल्
    4. (घ) अनुस्वार और चंद्रबिंदु
    उत्तर देखें

    (घ) हंस (पक्षी) में अनुस्वार, हँस (हँसना) में चंद्रबिंदु — अर्थ बदल जाता है।

  20. "वाङ्मय" में ङ् क्यों लिखा जाता है, अनुस्वार क्यों नहीं?

    1. (क) अगला वर्ण उसी वर्ग का है
    2. (ख) अगला वर्ण दूसरे वर्ग का है (म)
    3. (ग) यह तद्भव शब्द है
    4. (घ) ङ् कभी नहीं बदलता
    उत्तर देखें

    (ख) पंचमाक्षर के बाद दूसरे वर्ग का वर्ण आए तो पंचमाक्षर ही रहता है (मानक नियम)।

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संदर्भ

ये नोट्स हमने अपने शब्दों में लिखे हैं। नियमों और उदाहरणों का मिलान इन मानक स्रोतों से किया गया है:

  • केंद्रीय हिंदी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार — देवनागरी लिपि एवं हिंदी वर्तनी का मानकीकरण (संशोधित संस्करण, 2024): मानक वर्णमाला (अनु. 2) और वर्तनी के नियम (अनु. 3)
  • कामताप्रसाद गुरु, संक्षिप्त हिंदी व्याकरण, काशी नागरी प्रचारिणी सभा — वर्णविचार